स्वयंसेवी संस्थाओं का म.प्र. जन अभियान परिषद् में
पंजीकरण
जन अभियान परिषद् में स्वयंसेवी
संस्थाओं के पंजीयन की प्रक्रिया निम्नानुसार है :-
मध्यप्रदेश शासन के सक्षम अधिकारी (पंजीयन फर्म्स एंड सोसायटी)
कार्यालय में पंजीकृत संस्थायें, मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् में पंजीयन हेतु
आवेदन पत्र इस बेवसाईट के पंजीयन लिंक से
फॉर्म ए तथा फॉर्म बी
डाउनलोड कर सकती है।
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पंजीयन पूर्णतः निशुल्क है।
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फॉर्म ए में संस्था की सामान्य जानकारी एवं तथा फॉर्म बी
में संस्था की गतिविधियों का विवरण दिया जाना है।
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पंजीयन हेतु दोनों फॉर्म भरना अनिवार्य है।
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इन फॉर्मों को पूरी तरह भरकर, निम्नलिखित दस्तावेजों की
प्रतियों के साथ संबंधित जिला कार्यालय मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् में जमा
करना होगा।
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मध्यप्रदेश शासन के सक्षम अधिकारी (पंजीयन फर्म्स एंड
सोसायटी) कार्यालय द्वारा प्रदत्त संस्था का पंजीयन पमाणपत्र
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संस्था की नियमावली।
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तीन वर्षों की ऑडिट रिपोर्ट।
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विगत वर्ष की वार्षिक रिपोर्ट।
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अन्य सुसंगत दस्तावेज
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इस वेबसाइट पर उपलब्ध लिंक
संपर्क करें में
समस्त जिला समन्वयकों के संपर्क नम्बर उपलब्ध है, जिनसे आवश्यकता होने पर अधिक
जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
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विभिन्न जिलों में कार्यरत संस्था किसी भी एक जिले में ही
पंजीयन करा सकेगी।
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आवेदन पत्र अपूर्ण होने तथा संबंधित जानकारी स्पष्ट नहीं
होने की स्थिति में पंजीयन नहीं किया जावेगा।
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किसी भी संस्था या सोसायटी को पंजीकृत करने या न करने का
अधिकार म.प्र. जन अभियान परिषद् को होगा। इससे संबंधित किसी भी विवाद की स्थिति
में निर्णय का अधिकार म.प्र. जन अभियान परिषद् को होगा तथा न्याय क्षेत्र भोपाल
रहेगा म.प्र. जन अभियान परिषद् का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होगा।
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जिला समन्वयक द्वारा आवश्यक जाँच
एवं निर्धारित प्रक्रिया अनुसार पंजीयन की कार्यवाही की जावेगी, तत्पश्चात
पंजीकृत संस्था की जानकारी ई-डायरेक्ट्री में समावेशित कर ली जावेगी।
मध्यप्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1973 के अंतर्गत
संस्थाओं के पंजीकरण की प्रक्रिया
विकास के बदलते परिदृश्य में स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका
बढती ही जा रही है। पिछले एक-डेढ दशक में तो संस्थाओं की संख्या में न सिर्फ तेजी
से बढोतरी हुई है बल्कि सेवा व विकास के उन सभी क्षेत्रों तक इनके कार्यक्षेत्र का
विस्तार हुआ है जो अब तक इन संस्थाओं के लिए कमोवेश अछूते ही रहे थे। सरकार के साथ
उसके कार्यक्रमों में सहभागिता निभाने की दिशा में भी संस्थाएं बढ चढकर सामने आयी
हैं और दोनों के बीच नए प्रकार के समन्वित संबंधों की शुरूआत हुई है। इसके अलावा
संस्थाओं के बीच अपने-अपने विषयों पर विशेषज्ञता बढाने का चलन भी विशेष रूप से
सामने आने लगा है। सिविल सोसायटी के महत्वपूर्ण घटक के रूप में स्वयंसेवी संस्थाओं
की उपस्थिति अब हर कहीं दर्ज की जा रही है, इनकी भूमिका अब ज्यादा स्वीकार्य बनती
जा रही है, तथा दायरा व्यापक होता जा रहा है। समग्र समाज में संस्थाएं अपनी
चिरपरिचित पहचान प्राप्त करने लगी हैं।
स्वयंसेवी संस्थाओं का स्वरूप पहले अनौपचारिक हुआ करता था।
पर जैसे-जैसे इनकी संख्या बढी तथा इनके विभिन्न स्वरूप सामने आने लगे, सरकार को
इन्हें वैधानिक स्वरूप देने तथा नियम-कानूनों में बांधने की आवश्यकता महसूस हुई।
1860 में सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम बनाकर सरकार ने इसकी शुरूआत की। आज
वैधानिकताएं और बढ गई हैं। स्वैच्छिक संस्थाओं को वैधानिक रूप देना बहुत कठिन कार्य
है तथा इस प्रक्रिया में समय अधिक लगता है लेकिन इन सारी बाधाओं का निराकरण हो सकता
है अगर हम कुछ मुख्य चरणों को लेकर चलें क्योंकि संस्था समुदाय के साथ सघन रूप से
कार्य करती है, इसलिए संस्था निर्माण के पहल में नियोजन की बहुत बडी भूमिका होती
है। एक ऐसे नियोजन की अपेक्षा होती है, जो कि प्रभावशाली हो और समुदाय वातावरण
अनुरूप हो।
संस्थागत सदस्य अपने अनुभव, सैद्धांतिक पृष्ठभूमि तथा
प्रयोजनों से संस्था के आधारभूत ढांचे का निर्माण करते हैं और प्रारम्भिक संसाधन की
सहायता से इसका प्रारम्भ करते हैं। ये संसाधन स्थानीय लोग संस्था के उद्देश्यों को
सुदृढ तथा बल देने वाली अन्य समरूपी संस्थाएँ, कार्य प्रारम्भ करने के लिये थोडा सा
अनुदान देने वाली दाता संस्थायें आदि हो सकती है। किसी स्वयं-सेवी संस्था को
स्थापित करने की प्रक्रिया में व्यापक मिशन तथा दृष्टिकोण बाद में निश्चित
उद्देश्यों में परिवर्तित करना होता है। इनमें से कुछ उद्देश्यों को संस्था के
औपचारिक दस्तावेजों की जरूरत होती है। कुछ उद्देश्य कार्य के दौरान उभर आते हैं तथा
कुछ निश्चित समयावधि में परिवर्तित भी होते हैं इसलिये कुछ वर्षों बाद संस्था
पुराने उद्देश्यों पर कार्य करने के अलावा कुछ नये उद्देश्यों पर भी कार्य कर सकती
है अतः संस्थाओं को कानूनी रूप में पंजीकरण करवाना आवश्यक है तथा साथ ही साथ संस्था
के विजन मिशन भी तय करने होते है।
संस्था में विजन स्पष्ट हों
एक व्यक्ति के संदर्भ में यह माना जाता है कि उसके जीने का
आधार उसका कोई न कोई एक सपना होता है, एक लक्ष्य होता है जिसको पाने की आशा में वह
तमाम कोशिशें करता है। व्यक्ति उसी समय मृतप्राय हो जाता है जब उसका सपना लुप्त हो
जाता है तथा सपने को प्राप्त करने की सारी आशा क्षीण हो जाती है। कहने का भाव यह है
कि किसी को भी जीने के लिए जो तत्व उद्देश्य तथा दिशा प्रदान करते हैं वे
हैं-स्वप्न, लक्ष्य तथा उसको प्राप्त करने के लिए रणनीति आधारित प्रयास।
संस्था का भी एक जीवन होता है, जीवन चक्र होता है। यह जीवन
उतना ही लम्बा होगा तथा सामाजिक परिवर्ततन के लिए उतना ही उपयोगी हो सकेगा, जितना
स्पष्ट होगा इसके होने का कारण तथा इसके प्रयासों की दिशा। किसी संस्था को इसके
स्थापित होने का आधार व दिशा प्रदान करने वाले तीन ही तत्व हैं - इसका स्वप्न
(विजन), इसका लक्ष्य (मिशन) तथा इस लक्ष्य को प्राप्त करने की रणनीति। तार्किक
धरातल पर देखें तो बिना इन तत्वों के कोई संस्था अपने उद्देश्यों तथा गतिविधियों का
निर्धारण ही नहीं कर पायेगी। स्वप्न से लक्ष्य, लक्ष्य से उद्देश्य की पूर्ति के
लिए व्यापक रणनीति के तहत गतिविधियां चलाई जाती हैं। ये सभी तत्व आपस में जुडे हुए
हैं।
विजन-मिशन-रणनीति जैसे आधारभूत तत्वों पर समझ के अभाव में
तथा संस्था के संदर्भ में इनका उचित ढंग से निर्माण न होने की दशा में संस्था का
लंबे समय तक टिक पाना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि आज के दौर में कई
लक्ष्यहीन संस्थाएं अल्पायु में ही दम तोडती दिख जाती हैं।
संस्था में स्पष्ट और लिखित विजन-मिशन-रणनीति का होना एक और
महत्वपूर्ण अर्थ में आवश्यक है। संस्था के जीवन में सिर्फ संस्थापक व प्रारंभ में
जुडे कार्यकर्ता ही नहीं होते है। कई लोग इससे बाद में जुडते रहते हैं। कई बार
संस्था का स्वप्न, लक्ष्य तथा रणनीति संस्थापक तक ही सीमित रह जाता है। यह संस्थापक
तथा प्रारंभिक कार्यकर्ताओं के मन में कितना भी स्पष्ट क्यों न हो, अलिखित रह जाता
है तथा दस्तावेज के रूप में संग्रहित नहीं हो पाता है। बाद में जुडने वाले
कार्यकर्ताओं के संदर्भ में हम पाते हैं कि ये नये कार्यकर्ता सीधे-सीधे संस्था के
कार्यक्रमों से जुड जाते हैं न कि संस्था की सोच व स्वान से संस्था में नए
कार्यक्रम आते हैं तो नए कार्यकर्ता भी आते हैं। परन्तु संस्था में विजन-मिशन न
रहने पर उनका परिचय संस्था के वृहद लक्ष्य तथा रणनीति स नहीं हो पाता है। फल यह
होता है कि कार्यकर्ता अपनी व्यक्तिगत सोच को महत्व देने लग जाता है और संस्था के
कार्यक्रम की दिशा ही बदल जाती है। संस्था में स्पष्ट स्वप्न, लक्ष्य तथा रणनीति
होने की दशा में नया कार्यकर्ता जुडने से पहले ही यह विश्लेषण कर सकता है कि उसकी
अपनी व्यक्तिगत सोच संस्था की सोच से मेल खाती है अथवा नहीं। यदि दोनों का मेल होता
है, तभी नया व्यक्ति संस्था से जुड पाता है। इस प्रकार जुडने वाला व्यक्ति संस्था
की व्यापक सोच में शामिल हो जाता है तथा संस्था के लक्ष्य को हासिल करने में मददगार
सिद्ध होता है।
संस्था की रणनीति के संदर्भ में भी उपरोक्त बातें ही लागू
होती हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि संस्था की सफलता में इससे ज्यादा महत्वपूर्ण
बात कोई हो ही नहीं सकती है कि संस्था की एक स्पष्ट व प्रभावी रणनीति हो और जिस पर
संस्था के सभी लोगों की समझ हो तथा सभी उसी के अनुसार कार्य करते हों। एक बेहतर
रणनीति ही यह तय कर सकती है कि संस्था के लक्ष्य को सीमित साधनों के उपयोग से किस
प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।
संस्था का कानूनी रूप से पंजीकरण
स्वयंसेवी संस्था को एक कानूनी रूप प्रदान करने की आवश्यकता
तब होती है जब अपनी एक स्वतंत्र वैधानिक छवि बनाना चाहते है। संस्थाओं को कानूनी
सत्ता के रूप में पंजीकृत कराने से पहले उसके पंजीकरण की आवश्यकता की ओर गहरी समझ
तथा ध्यान देना महत्वपूर्ण है। यह पंजीकरण के विभिन्न रूपों की कानूनी आवश्यकताओं
की दृष्टि से भी आवश्यक है।
पंजीकृत स्वयंसेवी संस्था एक वैधानिक स्वरूप धारण करती है।
इसका अपना जीवन स्थापना करने वाले सदस्यों तथा कार्यरत सदस्यों से स्वतंत्र होता
है।
स्वयंसेवी संस्थाओं के कानूनी विधा के रूप में पंजीकृत हो
जाने के बाद निश्चित नियमों, प्रक्रियाओं, मानकों तथा विधियों में बंध जाते हैं और
अनेक संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करने के लिये बाध्य हो जाती हैं।
आज के परिवेश में स्वैछिक संस्थाए एक जटिल माहौल से गुजर रही
है। पिछले चार दशकों में कुछ ऐसा माहौल बना है कि जिसमें स्वैच्छिक विकास कार्यक्रम
से जुडे हुए लोग अपने संस्थागत निर्माण के प्रश्न से कटे रहे। वस्तुतः एक विचारधारा
ऐसी भी चली जिसमें कि स्वैच्छिक विकास संस्थाओं को एक शैक्षणिक और सामयिक भूमिका
निभायें, न कि लम्बे समय तक चलने वाली सामाजिक व्यवस्था के एक अभिन्न अंग के रूप
में। स्वैच्छिक विकास संस्थाए शैक्षणिक हों, कुछ समय तक ही चले या लम्बे समय तक
सुदृढ रूप से समाज में अपना स्थान तैयार करें, यह हमारी सोच और समझ पर निर्भर करता
है।
संस्थागत मुद्दे में सबसे पहला मुद्दा तो औपचारिक ढांचे
का है। जिस दिन विकास का कोई कार्यक्रम स्वैच्छिक रूप से चलाये जाने के साथ-साथ एक
संस्था का रूप ले लेता है, तब संस्था को एक वैधानिक रूप देना होता है। उसी दिन से
संस्था का एक औपचारिक ढाँचा भी शुरू हो जाता है। कई बार ऐसा होता है कि सामाजिक
परिवर्तन की विधा में जुडे ये संगठन और संस्थाए अपने आपको एक संस्था के रूप में
नहीं देखते, बल्कि मात्र एक कार्यक्रम के रूप में समझते हैं। संस्था निर्माण के तहत
जिन चीजों पर ध्यान देना जरूरी है वह नहीं हो पाता- जैसे कि संस्था में कार्यरत
लोगों के लिए काम का बटँवारा, उनकी भूमिकाओं का निरूपण और साथ-साथ लगातार अपने
कार्य को और सुचारू ढंग से करने के लिए उनकी व्यक्तिगत और सामूहिक तैयारी। इस
परिस्थिति में कई वैधानिक कठिनाईयों की आने की संभावनाएँ हैं।
संस्थाओं के पंजीयन/वैकल्पिक पंजीयन/वैधानिक आवश्यकताओं के
प्रकार
उपरोक्त जरूरतों को देखते हुए स्वैच्छिक संस्थाओं के लिए
बहुत से अधिनियम है, संस्थाएँ अपनी इच्छानुसार किसी भी अधिनियम के तहत पंजीकृत करा
सकती हैं, लेकिन संस्थाओं को सभी वैधानिक आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होगी। अधिनियम
एवं वैधानिक जरूरतों की संक्षिप्त जानकारी निम्न प्रकार से है :
| संस्था के पंजीयन के प्रकार |
वैकल्पिक पंजीयन |
वित्तीय जरूरतों के प्रकार |
| म.प्र. सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1973 |
एफ.सी.आर.ए. (पूर्व अनुमति) |
आयकर पंजीकरण प्रविधि (12 A) |
| म.प्र. लोक न्यास अधिनियम 1951 (स्थाई) |
एफ.सी.आर.ए |
आयकर प्रविधि |
| कम्पनी अधिनियम अधिनियम 1956 |
आयकर (धारा 80जी) |
स्थानीय खाता (PAN No.) स्त्रोत पर कर कटौती तथा कटौती
नं. (TAN No.) |
संस्था के पंजीकरण के लिये उपरोक्त सभी प्रकार के कानून
मध्यप्रदेश में उपलब्ध हैं जिनमें से संस्था के उद्देश्य तथा आकार को दृष्टिगोचर
रखते हुए किसी एक अधिनियम के तहत पंजीकरण किया जा सकता है।
म.प्र. सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम (1973) के तहत पंजीयन
कोई भी व्यक्ति या समूह को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी
भी औपचारिक पंजीयन के तहत विकासात्मक कार्य कर सकता है। निम्नलिखित कुछ कारण हैं
जिनकी वजह से संस्थान का पंजीकृत होना आवश्यक है :
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संस्थान के नाम पर संपत्ति रखने का अधिकार कानूनी तौर पर
मिल जाता है।
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संस्थान के नाम पर कानूनी तौर पर अधिकार से संपत्ति का
स्थानांतरण कोई कर अथवा शुल्क प्रदान किये बिना भी नयी-पीढी को आसानी से किया
जा सकता है।
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संस्थान के नाम से बैंक खाता खोला जा सकता है।
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संस्था को इन्कम टैक्स, एफ.सी.आर.ए. एवं वैधानिक अधिनियम
के अंतर्गत पंजीयन आसानी से किया जा सकता है।
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अनुदान प्राप्त करने तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन
हेतु संस्था की एक अलग साख के निर्माण में सहायक होती है।
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पंजीयन होने के पश्चात संस्था को कानूनी संगठन का स्वरूप
मिल जाता है तथा किसी से अनुनय व विनय करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम में पंजीकरण की प्रक्रिया
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सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1973 के अंतर्गत कम से कम 7
अथवा इससे अधिक सदस्यों का समूह संस्था का पंजीकरण करवा सकते हैं। (प्रारूप
संलग्न-1)
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संस्था शिक्षा, वैज्ञानिक या चेरिटैबल उद्देश्यों पर
कार्य कर सकती है। सेक्शन २0 में उद्देश्यों का विस्तृत रूप में वर्णन किया गया
है जिनके तहत स्वैच्छिक संस्थाएँ पंजीकृत की जा सकती है।
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संस्थापक को संस्था का ज्ञापन तथा नियमावली (बायलॉस)
तैयार करने होते हैं तथा सोसायटी के रजिस्ट्रार के पास जमा करना होता है।
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सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1973 के अतिरिक्त भारत के
विभिन्न राज्यों ने अपने राज्य के परिप्रेक्ष्य में अधिनियम तथा नियम बनाये
हैं।
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संस्था राज्य के नियम के तहत पंजीकृत की जा सकती है।
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संस्था भारत के किसी भी जिले में पंजीकरण करवा सकती है
इसके लिये संस्था को सोसायटी के जिला स्तर के सहायक रजिस्ट्रार के पास पंजीयन
करवाना होता है, लेकिन मितव्यवता एवं साख सोसायटी पंजीकरण का कार्यक्षेत्र जिले
की सीमा में होता है।
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संस्था वृहद रूप में राज्य स्तर पर कार् करना चाहती है
तो संस्था का पंजीकरण उस राज्य के सोसायटी के रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण कराना
होगा।
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पंजीकरण हो जाने पर संस्था के कार्यों के लिए कोई एक
सदस्य उत्तरदायी नहीं होता, अपितु सब सदस्य संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते हैं।
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संस्था (जो कि व्यक्तियों का समूह है) को स्थायी दर्जा
मिल जाता है।
पंजीकरण हेतु आवश्यक दस्तावेज
पंजीकरण के लिये निम्न दस्तावेजों को तैयार करने की आवश्यकता
होगी :
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सभी सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन पत्र ज्ञापन
(नमूना संलग्न - 1)।
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नियमावली (बायलॉज) या नियम तथा विनियमों की प्रमाणित
प्रतिलिपि (नमूना संलग्न - २)।
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संस्थान के अध्यक्ष/सचिव द्वारा स्टाम्प पेपर पर शपथ
पत्र। यह शपथ पत्र कार्यपालन जिलाधीश या नोटरी द्वारा सत्यापित होना चाहिये
(नमूना संलग्न - 3)।
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पंजीकृत कार्यालय प्रक्षेत्र का दस्तावेज रूप में
प्रमाण। प्रमाण मकान कर या किराया पावती के रूप में हो सकता है। मकान अथवा
भूस्वामी का अनापत्ती प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत करना चाहिये।
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आवश्यक फीस के साथ पंजीकरण हेतु रजिस्ट्रार के नाम पत्र
के साथ जमा करना एवं चालान की प्रति भी रजिस्ट्रार को जमा करना होगा। - (संलग्न
5)
पंजीयन हेतु प्रमाण पत्र
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सोसायटी के का रजिस्ट्रार दस्तावेजों का सत्यापन करेगा
तथा पंजीयन के प्रमाण पत्र की प्रक्रिया शुरू करेगा।
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दस्तावेजों में नियमानुसार कोई सुधार है तो सुधार करने
के बाद, रजिस्ट्रार पंजीयन का प्रमाण पत्र प्रदान करेगा।
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प्रमाण पत्र तथा बायलॉस किसी भी सोसायटी के पंजीयन हेतु
प्राथमिक आवश्यकता है।
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उपरोक्त दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपि का उपयोग अन्य
कानूनी तथा प्रशासनिक कार्यों में किया जाता रहेगा।
सदस्यों की जवाबदारी एवं अधिकार
जो व्यक्ति सोसायटी के सदस्य हैं वह सोसायटी का अंश होता है।
किसी सदस्य के प्रति कानूनी कार्यवाही व्यक्तिगत रूप से नहीं की जायेगी। सदस्यों के
जबावदारी एवं अधिकार निम्न प्रकार से हैं :
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सूचना को प्राप्त करने का अधिकार
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वोट देने का अधिकार
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नियमावली (बायलास) प्राप्त करने का अधिकार
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लेखा प्राप्त करने का अधिकार
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सामान्य सभा (जनरल मीटिंग) में उपस्थिति का अधिकार
जवाबदारी एवं कर्तव्य
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सोसायटी के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु कार्य करना
प्रत्येक सदस्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है।
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सदस्यों के लिये यह आवश्यक है कि वे नियमित रूप से
बैठकों में भाग लें तथा जब-जब आवश्यकता हो अपने अधिकार का लोकतांत्रिक रूप से
निर्वाह करें।
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किसी सदस्य द्वारा सोसायटी सदस्यों के प्रति निम्न
मुद्दों पर कार्यवाही कर सकती है :-
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सदस्यता शुल्क की रिकवरी कर सकती है।
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संस्थागत सम्पत्ति के नष्ट के लिए वसूल कर सकती है।
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किसी सदस्य द्वारा सोसायटी के वित्तीय संसाधन के
दुरूपयोग होने पर वैधानिक प्रक्रिया।
संस्था के मुख्य दस्तावेज के दुरूपयोग हेतु।
नोट - म.प्र. सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1973 का प्रारूप
संलग्न (४) है।