विकास की राह टटोलता ग्राम गोपालपुरा, खिलचीपुर विकासखण्ड से ३१ किलोमीटर दूर स्थित है। इस गाँव में २०७ परिवार रहते हैं। १०५० आबादी वाला पिछड़ी जाति बाहुल्य यह ग्राम विकास में भी पीछे था। राजस्थान राज्य के झालावाड़ जिले की सीमा से मात्र १० किलोमीटर पहले बसे इस गाँव में शासकीय कर्मचारी जाने से डरते थे क्योंकि इस क्षेत्र में दिन दहाड़े मारपीट कर वस्तुएँ छुड़ा लेना आम बात थी। आज भी शाम ५ बजे के बाद कोई भी बाहरी व्यक्ति इस क्षेत्र में नहीं जाता है। गाँव में आर्थिक विपन्नता, शिक्षा, कुसंस्कार की विसंगति थी। इसीलिए समग्र ग्राम विकास के लिये इस गाँव का चयन किया गया। विकासखण्ड समन्वयक ने कई बार समिति व समुदाय की बैठक कर यह निष्कर्ष निकाला कि गाँव व किसानों की समृद्घता के लिये जैविक खेती पर कार्य किया जाये। किसानों से बातचीत करने पर पता चला कि प्रत्येक किसान भरपूर मात्रा में रासायनिक खेती करते हैं। जब किसानों को रासायनिक खेती से होने वाले दुष्प्रभाव, हानियाँ व भूमि के बंजर हो जाने के कारण बताये तो सभी किसानों ने एक स्वर में कहा कि हमें ऐसी रासायनिक खेती नहीं करनी है जो हमारी जमीन को नष्ट कर दे। हमें तो अपनी पुरातन खेती करनी है जो परंपरागत तरीके से की जाती रही है। कृषि को लाभ का धंधा बनाने के उद्देश्य से जैविक खेती की जानकारी के लिये यहाँ विगत १ वर्ष में लगभग १० बार कृषि विभाग के सहयोग से कृषि प्रशिक्षण शिविर लगाये गये। प्रस्फुटन समिति ने ग्रामीणें से विचार विमर्श कर भू-नाडेप, नाडेप, वर्मी कम्पोज बनाये जाने के लिये कृषि विभाग को प्रस्ताव दिये। सतत् प्रयासों के चलते १४२ किसानों का कृषि विभाग में पंजीयन व १२ नाडेप का निर्माण कार्य सम्पन्न किया गया है। इससे किसान लाभान्वित हो रहे हैं। आज की स्थिति में इस गाँव में लगभग सभी किसान पूर्णतः जैविक कृषि किये जाने की ओर अग्रसर हैं। सभी किसानों ने २ या ३ बीघा जमीन पर जैविक खेती कर प्रयोग भी किया है। इस प्रयोग का परिणाम यह रहा कि कृषि उत्पादन में न सिर्फ उत्कृष्टता आयी है बल्कि किसानों ने रासायनिक खेती की अपेक्षा जैविक खेती से अधिक उत्पादन लिया है। इन किसानों ने कीटों पर नियत्रंण हेतु गौमूत्र, छांछ, नीम की पत्ती से दवाई भी स्वतः निर्मित की थी, जिसका प्रयोग करने के बाद परिणाम उत्साहवर्धक रहा और फसल भी अच्छी आयी। गौ संवर्धन की दिशा में भी ग्राम में अभिनव प्रयास शुरू किया है। प्रत्येक घर में एक गाय का पालन पोषण कर जैविक कृषि को बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है।
गाँव में आर्थिक विपन्नता, शिक्षा, कुसंस्कार की विसंगति थी। इसीलिए समग्र ग्राम विकास के लिये इस गाँव का चयन किया गया। विकासखण्ड समन्वयक ने कई बार समिति व समुदाय की बैठक कर यह निष्कर्ष निकाला कि गाँव व किसानों की समृद्घता के लिये जैविक खेती पर कार्य किया जाये।
विकासखण्ड महू से ४२ किलो मीटर दूर बसा है ग्राम ग्वालु। १००० जनसंख्या वाले इस ग्राम का मुख्य व्यवसाय कृषि है। ग्राम में मुख्यतः अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं। जन अभियान परिषद् द्वारा चयनित इस प्रस्फुटन ग्राम में समिति सदस्यों की संख्या १० है। प्रस्फुटन समिति सदस्यों ने ग्राम में बहुतायत में फैली गाजरघास और उससे पशुओं एवं ग्रामीणों को होने वाली बीमारियों को लेकर विचार विमर्श किया। बैठक में समिति द्वारा निर्णय लिया गया कि क्यों न हम ग्राम से गाजरघास का सफाया कर दें,। समिति सदस्यों के साथ ग्रामीणों ने भी अपनी सहमति जताई। अगले दिन गाजरघास उन्मूलन के लिए प्रस्फुटन समिति के १० सदस्यों तथा ग्राम के कुछ नागरिकों ने कार्य प्रारंभ किया। सबने मिलकर प्रतिदिनि २ घण्टे श्रमदान किया। तीन दिनों में गाँव से गाजर घास उखाड़ दी गयी। इस तरह से समिति सदस्यों ने ग्राम ग्वालु को गाजरघास मुक्त ग्राम बनाया।
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