नशा मनुष्य के सोचने समझने की शक्ति के साथ ही पूरे शरीर पर प्रहार करता है। इसका प्रहार इतना प्रखर होता है कि धीरे धीरे शरीर ही नष्ट हो जाता है। यह एक ऐसा धीमा जहर होता है कि लोग जब तक इसके दुष्परिणामों को समझ पाते हैं तब तक उनका अंत हो जाता है। नशा कई रूपों में किया जाता हैं शराब, तम्बाकू,पाऊच आदि सभी नशे की श्रेणी में आते हैं।इन सबमें तम्बाकू का सेवन भारत में सबसे अधिक होता है। करीब आधी दुनिया में भले ही तम्बाकू पर प्रतिबंध को लेकर जोर शोर से दावे किए जा रहे हों लेकिन वास्तव में यह दुनिया भर में एक वर्ष में ५४ लाख जानें लील रहा है। दुनिया में एक अरब लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं। भारत में सालाना ९ लाख मौतें तम्बाकू से होती हैं। दस में से एक मौत में तम्बाकू वजह बनती है। वहीं विश्व में तम्बाकू सेवन में भारत का दूसरा स्थान है। यह चितंनीय है, इस पर कार्य की महती आवश्यकता है। आशंका ये भी जताई जा रही है कि २०३० तक ८० लाख लोगों की तम्बाकू से मौते होंगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष १९८८ से दुनिया को तम्बाकू के घातक दुष्परिणामों से सचेत करने के लिए ३१ मई को विह्णा तम्बाकू दिवस मनाया जाता है। लेकिन इस दिवस के क्या मायने हैं यह तो आंकड़े देखकर ही पता चलता है। नशामुक्ति के लिए अनेक योजनाएं बन रही है, कई कार्यक्रमों का संचालन होता है और परिणाम सबके सामने है। नशे का यह धीमा जहर आयोजनों से नहीं बल्कि खुद की इच्छा शक्ति, और जागरूकता से कुछ हद तक कम हो सकता है। शहरों, कस्बों में भले ही आयोजन से कुछ परिवर्तन हो सकते हैं लेकिन भारत की ७० प्रतिशत जनता आज भी गाँवो में निवास करती हैं। गाँव के ८० प्रतिशत लोग नशे के आदि होते हैं। जिन्हें जागरूक किए बिना कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता है।नशे के दुष्परिणामों को देखते हुए म.प्र. जन अभियान परिषद् द्वारा गठित प्रस्फुटन समितियों ने नशामुक्ति के तहत प्रस्फुटन समितियों द्वारा नशा मुक्ति के क्षेत्र में किये गये कार्य:-
प्रदेश के गाँव-गाँव में जागरूकता अभियान चलाया है। प्रस्फुटन समितियो के माध्यम से इसके सार्थक परिणाम भी आने लगे हैं। जन भागीदारी और जन सहयोग से नशामुक्ति पर हुए कार्यों से लोगों में जागरूकता आयी है। इसी का परिणाम है कि आज प्रदेश में ३६ गाँव पूर्णतः नशामुक्त हो गए हैं। कई गाँवों के लोगों ने नशा छोड़ने का संकल्प लिया है। हम जानते हैं यह आंकड़े बहुत कम है लेकिन यह एक ईमानदार प्रयास है। प्रस्फुटन समितियों द्वारा किये गये आरम्भिक प्रयासों ने उम्मीद जगाई है। विश्वास निर्मित किया है।
देवास जिले के विकासखण्ड बागली का ग्राम खेरखेड़ी आज पूर्णतः नशामुक्त गाँव है। एक समय था जब गाँववासी शराब व अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन करते थे लेकिन अब जन अभियान परिषद् द्वारा गठित प्रस्फुटन समिति के प्रयास से यह गाँव नशामुक्त बनकर दूसरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गया है। इस गाँव की कुल जनसंख्या २२१ है। यहाँ की करीब ७० प्रतिशत जनसंख्या पहले से ही नशा नहीं करती थी। लेकिन जो ३० प्रतिशत ग्रामीण नशा करते थे। समिति ने उनकी सूची बनाकर उन्हें सीख समझाईश दी। नशा करने वालों को बताया गया कि नशे के क्या नुकसान है? पहले तो कुछ ग्रामीणों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब एक दो ग्रामीणों ने समिति की समझाईश पर नशा न करने का निर्णय लिया तो धीरे धीरे अन्य ग्रामीण भी नशामुक्ति अभियान से जुड़ गए। जब ग्रामीणों ने नशा न करने का निर्णय लिया तो ग्राम में नशा करने वाले व्यक्ति पर २०० रुपये दंड का प्रावधान भी निर्धारित किया गया। साथ ही यह भी निर्णय लिया कि ग्राम में जो दुकानदार नशीली वस्तुओं की बिक्री करते हुए पाए गए उनसे ग्रामीणों द्वारा अन्य सामान नहीं खरीदा जाएगा। इस निर्णय से प्रभावी परिणाम मिले और गाँव पूर्णतः नशामुक्त हो गया। जन अभियान परिषद् की प्रस्फुटन समितियों का नशामुक्ति भियान खेरखेड़ी गाँव तक ही सीमित नहीं है। अब तक प्रस्फुटन समिति की प्रेरणा से प्रदेश के ३६ गाँव पूर्ण नशामुक्त हो चुके हैं। उम्मीद है यह जागरूकता धीरे धीरे पूरे प्रदेश में फैलेगी। यदि प्रस्फुटन समितियों के साथ इस जागरूकता अभियान में सम्पूर्ण समाज जुड़ जाये तो सम्पूर्ण नशा मुक्त गाँव की यह श्रृंखला सम्पूर्ण नशामुक्त प्रदेश में बदल सकती है।
भोपाल संभाग के राजगढ़ जिले से २५ किलोमीटर दूर बसा एक छोटा सा गाँव सिरौजी जिसकी आबादी ४०० है। पिछड़ी जाति बाहुल्य इस ग्राम में प्रस्फुटन समिति के गठन से पूर्व ग्रामवासियों द्वारा विभिन्न प्रकार के नशे का प्रयोग किया जाता था। कुल जनसंख्या के लगभग २० प्रतिशत लोग शराब का सेवन करते थे। बच्चों ने भी बड़ों को देखकर पाऊच, बीड़ी का प्रयोग करना शुरू कर दिया था। समिति द्वारा ग्राम में व्यक्तिगत सम्पर्क कर लोगों को समझाईश दी गई व नशे से होने वाले दुष्प्रभाव, शारीरिक क्षति व धन बर्बादी की जानकारी दी। प्रारंभ में लोग बात को नजर अंदाज कर देते थे। समिति सदस्यों ने सर्वप्रथम एक व्यक्ति पर कार्य शुरू किया। यह व्यक्ति जब भी नशे की दुकान के पास जाता तो समिति के सदस्य उसके पीछे पीछे चले जाते जैसे ही वह नशे की सामग्री खरीदने की कोशिश करता समिति सदस्य उससे वह पैसा ले लेते और उसे बहला फुसला कर उस दुकान से अन्य जगह ले जाते। करीब एक माह तक ऐसा किया गया व जो पैसा समिति सदस्यों द्वारा इकट्ठा किया गया था उस पैसे को उनके घर वालों को देकर बैंक में जमा करवा दिया। ऐसा करतेकरते ६ माह तक लगातार समिति सदस्यों द्वारा प्रयास किया गया। जो शराब पीने वाले व्यक्ति थे उनका बैंक में खाता खुलवाकर उन व्यक्तियों को आर्थिक मजबूती प्रदान की गई। इसे देख नशे से ग्रस्त लोगों ने नशा न करने का संकल्प लिया। वे नशे में खर्च होने वाली प्रतिदिन की राशि को समिति के पास जमा कर देते और बाद में समिति उस राशि को संबधित व्यक्ति के बैंक खाते में जमा कर देती थी। आज की स्थिति में गाँव के प्रत्येक नशा करने वाले व्यक्तियों के पास ८ से ९ हजार रुपये बचत राशि है। यह देख गाँव के बच्चों ने भी नशा करना बंद कर दिया है। अब इस ग्राम में एक भी दुकान पर तम्बाकू के पाऊच नहीं मिलते हैं।
राकेश गुप्ता जिला समन्वयक, राजगढ़, म.प्र. ज.अ.प.
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