एक वृक्ष अपने जीवन में १५.७० लाख रुपये कीमत की वस्तुएं व लाभ देता है
भारतीय संस्कृति अरण्य संस्कृति रही है। विकास के साथ बढ़ती अति उपभोगी संस्कृति ने इसे अक्षुण्ण रखने की जगह विखंडित कर दिया है। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं, जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे पर्यावरण पर पड़ रहा है। उपभोक्तावाद से पर्यावरण संकट में खड़ा है। विकास की अंधी दौड़ में हमने जंगल काटे, कांक्रीट का जाल बिछाया नतीजे में प्राकृतिक आपदाओं सूखा, बाढ़, जलवायु परिवर्तन आदि को न्यौता दे दिया। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई व जनसंख्या के बढ़ते दबाव से पारिस्थितिकीय संतुलन गड़बड़ाने लगा है। एक प्रतिशत की वार्षिक दर से घटते जंगल दुनिया के लिए एक चेतावनी है। वक्त रहते नहीं जागे तो वन केवल स्मृतियों में सिमट कर रह जाएंगे। अब इन्हें संरक्षित करने की जरूरत है। पर्यावरण को संतुलित रखने में वनों का बहुत महत्व है। दुनिया के सभी प्रदूषणों को वनों से रोका जा सकता है। हम जानते हैं कि वन कार्बन डॉई ऑक्साईड को सोखकर शुद्घ ऑक्सीजन छोड़ते हैं। लेकिन दिनोंदिन घटते वनों के कारण दुनिया में वनों के क्षेत्रफल में कमी होती जा रही है और वायुमण्ड़ल प्रदूषित हो रहा है। यह स्थिति किसी एक देश की नहीं है बल्कि विश्व के सारे देशों की है। भारत की बात करें तो लगभग ६ दशक पहले देश में ४० प्रतिशत जमीन वनाच्छादित थी। धीरेधीरे जंगल कटते गए और आज केवल १० प्रतिशत जमीन पर ही वन हैं। जिसका सीधासीधा प्रभाव वातावरण पर पड़ रहा है। देश में अल्पवर्षा, सूखा, बाढ़ जैसी आपदाएं होने लगी हैं। आदर्श स्थिति में देश के ३३ प्रतिशत भूभाग पर हरित पट्टी होनी चाहिए उसके बदले भारत में केवल १० फीसदी जगह पर वन हैं। महात्मा गाँधी ने लगभग एक शताब्दी पहले कहा था धरती सभी मनुष्यों एवं प्राणियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है परंतु किसी की तृष्णा को शांत नही कर सकती। वर्तमान परिस्थिति में गांधी जी का कथन बिल्कुल सही है। अब इस विखंडित पर्यावरण में मनुष्य पर्यावरण का नियंत्रित दोहन भी कर रहा है और संरक्षण पर भी चिंता कर रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से पृथ्वी को बचाने के उद्देश्य से गत वर्ष दुनिया के करीब १९२ देशों के १५ हजार सदस्य कोपेनहेगन में इकट्ठे हुए थे। सबकी एक ही चिंता थी।
पर्यावरण प्रदूषण को रोकना। सब देशों ने अपने अपने तरीके से पर्यावरण को बचाने के उपाय सुझाये। कुल मिलाकर पर्यावरण बचाने का एक ही विकल्प है पौधरोपण। बिगड़ता पर्यावरण चिंता का विषय है। पर्यावरण संरक्षण के लिए सबको आगे आने की आवश्यकता है। हरेक को पेड़पौधे को संरक्षित करना होगा। जितना हो सके वनों की रक्षा करें और अधिक से अधिक अपने आसपास पौधों को रोपे।जहां तक मध्यप्रदेश की बात की जाए तो देश में सबसे ज्यादा वन मध्यप्रदेश में हैं। जहां ३१ फीसदी भूभाग घोषित वन क्षेत्र हैं जबकि २५.२१ फीसदी भूभाग पर ही वास्तविक रूप से वन हैं। घोषित वन क्षेत्र के ६५.३६ फीसदी आरक्षित वन है, जबकि संरक्षित वन ३२.८४ व वर्गीकृत वन १.८ फीसदी है। ९ नेशनल पार्क व २५ वन्यजीव अभ्यारण्य हैं। अपेक्षाकृत म.प्र. की स्थिति भले ही अच्छी हो लेकिन और प्रयासों की जरूरत है।
प्रस्फुटन समितियों द्वारा हरियाली के क्षेत्र में किये गये कार्य
म.प्र. में पौधरोपण को लेकर होने वाले प्रयासों में शासकीय हरियाली महोत्सव के तहत पौधों का रोपण किया जा रहा है। म.प्र. जन अभियान परिषद् के अंतर्गत गठित प्रस्फुटन समितियां गाँवगाँव में पौधरोपण कर वाटिकाएं बनाने का अनुकरणीय कार्य कर रही हैं। अब तक प्रस्फुटन समितियों के माध्यम से १३,५२,७६१ पौधों का रोपण और वाटिकाओं का निर्माण किया गया है। यह प्रयास निरंतर जारी हैं। नीम गाँव बसीपीपरी पौधरोपण को लेकर इंदौर जिले के बसीपीपरी गाँव ने ऐतिहासिक कार्य किया है। अद्वितीय पहाड़ियों के बीचों बीच बसा २५०० की आबादी वाला यह प्रस्फुटन गाँव बसीपीपरी बसी माता के नाम से विख्यात है। गाँव में चोरल नदी के बांध तथा छोटे छोटे ८ तालाबों से घिरा यह गाँव ८ फलियों से बंटा हुआ है। सभी फलिये १४ कि.मी. की परिधि में बसे हैं लेकिन आपस में जुड़ें हैं। ये जिस मार्ग से जुड़े हुए हैं उसके दोनों किनारों पर लगभग ५१,००० सघन नीम एवं २५,००० फलदार पौधों की कतार देख आश्चर्य होता है। सिर्फ एक गाँव में ७६,००० पौधों का रोपण होना विह्णासनीय है, दुर्लभ है। पौधरोपण के इस अभूतपूर्व कार्य को आकार दिया है बसीपीपरी प्रस्फुटन समिति के अध्यक्ष श्री शोक पाटीदार ने। श्री पाटीदार की परिकल्पना, प्रस्फुटन समूह का नेतृत्व, ग्रामीणों की भागीदारी व पंचायत के सहयोग ने मिलकर यह कीर्तिमान रचा है। पौधारोपण के इस अभूतपूर्व कार्य को आकार दिया है बसीपीपरी प्रस्फुटन समिति के अध्यक्ष श्री अशोक पाटीदार ने। श्री पाटीदार की परिकल्पना, प्रस्फुटन समूह का नेतृत्व, ग्रामीणों की भागीदारी व पंचायत के सहयोग ने मिलकर यह कीर्तिमान रचा है। पौधारोपण के इस अभूतपूर्व कार्य को आकार दिया है बसीपीपरी प्रस्फुटन समिति के अध्यक्ष श्री अशोक पाटीदार ने। श्री पाटीदार की परिकल्पना, प्रस्फुटन समूह का नेतृत्व, ग्रामीणों की भागीदारी व पंचायत के सहयोग ने मिलकर यह कीर्तिमान रचा है। श्री पाटीदार ने स्वयं के व्यय पर ५१ हजार पौधे उपलब्ध कराये और अपने गाँव को हरेभरे वृक्षों से समृद्घ कर दिया। अब समिति सदस्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी रोपे गये पौधों का संरक्षण। अतः जन अभियान परिषद् के मार्गदर्शन में प्रस्फुटन समिति द्वारा आठों फलियों में ११११ व्यक्तियों की टोलियाँ बनाई गई एवं पौधों की सुरक्षा हेतु प्रतिदिन सुबह ६७, एक घंटा श्रमदान सुनिश्चित किया गया। निर्णयानुसार ग्रामीण जन अपने दायित्व का निर्वहन पूरी मंशा से कर रहे हैं। वे प्रतिदिन निर्धारित समय पर श्रमदान से पौधों की सफाई, पानी एवं कांटों की बागड़ लगाने का कार्य करते हैं। इस तरह बसीपीपरी गाँव ने पौधरोपण की मिसाल कायम कर यह साबित कर दिया कि यदि दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो प्रकृति को हरा भरा कर बिगड़ते पर्यावरण, को संवारा जा सकता है। यही इच्छा यदि हरेक में जागृत हो जाये तो हम निश्चित ही पर्यावरण संकट दूर कर सकते हैं।
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