ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है। इसी को चरितार्थ करने में लगी हुई हैं म.प्र. जन अभियान परिषद् द्वारा गठित ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियाँ। इनके सार्थक प्रयास और लोगों की सहभागिता से प्रदेश के लगभग ४०० गांवों को पूर्ण सी.एफ.एल. किया गया है। कुछ ऐसा ही सार्थक कार्य किया है प्रस्फुटन गांव घट्टी ने।विगत दिनों म.प्र. जन अभियान परिषद् खरगौन जिले के अन्तर्गत गठित ग्राम विकास प्रस्फुटन समिति घट्टी द्वारा ग्राम विकास यात्रा के दौरान नुक्कड नाटक के माध्यम से लोगों को जागरुक करते हुए ऊर्जा संरक्षण के बारे में जानकारी दी गई। जिससे प्रभावित होकर गांव के वरिष्ठजनों ने पूरे ग्राम में सी.एफ.एल. लगाने का निर्णय लिया। इस पहल में ग्रामीण स्वयं आगे आए। ग्राम में कुल ७० घरों में ९५ पीले बल्ब हाटाये गए। उनके स्थान पर ११५ सी.एफ.एल. लगाने का कार्य किया गया। इस कार्य में ग्राम पंचायत का भी सराहनीय योगदान रहा। ऊर्जा बचत के लिए गांव में सी.एफ.एल. लगाने का कार्य पूर्ण होने पर समिति सदस्यों और ग्रामवासियों ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में ग्राम घट्टी को १०० प्रतिशत सी.एफ.एल. ग्राम घोषित किया गया। कार्यक्रम में संभागीय समन्वयक, जिला व विकासखण्ड समन्वयक सहित गांव के सभी लोग उपस्थित थे।
तोताराम गोलकर
अध्यक्ष ग्राम विकास प्रस्फुटन समिति
घट्टी जिला खरगौन
ग्राम मुंगेला की महिलाओं के पर्यावरण प्रेम ने वह कार्य कर दिखाया है जिसके लिए कई संस्थाएँ लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी समर्थ रहती हैं। इस तरह के प्रयोग से जलाऊ लकड़ी की तो बचत होती ही है साथ ही समय की भी बचत होती है। ग्रामवासियों द्वारा किया गया यह प्रयास सराहनीय है। इस कार्य की शुरूआत तब हुई जब समिति प्रमुख संजय राजपूत ने ग्राम भ्रमण में पाया कि ग्राम के ८० परिवारों में १०-१२ परिवार दो मुँहे चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं।
धार जिले के बदनावर विकासखण्ड के प्रस्फुटन गाँव मुंगेला के १२ परिवारों ने ऊर्जा बचत का अनोखा प्रयास किया है। ये परिवार दो मुँहे चूल्हों से एक साथ दो वस्तुओ को आसानी से पका लेते हैं। इस तरह के प्रयोग से ग्राम के अन्य व्यक्ति भी प्रोत्साहित होने लगे।ग्राम मुंगेला का चयन प्रस्फुटन योजना के प्रथम चरण में किया गया था। ८० परिवारों का यह ग्राम विकासखण्ड मुख्यालय से ८० कि.मी. दूर स्थित है। ग्राम मुंगेला की महिलाओं के पर्यावरण प्रेम ने वह कार्य कर दिखाया है जिसके लिए कई संस्थाएँ लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी समर्थ रहती हैं। इस प्रयोग से जलाऊ लकड़ी व समय दोनों की बचत हो रही है।ग्रामवासियों द्वारा किया गया यह प्रयास सराहनीय है। इस कार्य की शुरूआत तब हुई जब समिति प्रमुख संजय राजपूत ने ग्राम भ्रमण में पाया कि ग्राम के ८० परिवारों में १०१२ परिवार दो मुँहे चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं। तब समिति सदस्यों ने घर घर जाकर वहाँ की महिलाओ से चर्चा की और उन्हें उन्नत चूल्हों के निर्माण के लिए प्रेरित किया। प्रारंभ में समिति की महिलाओ ने पने घर उन्नत एवं धुँए रहित चूल्हों का निर्माण किया। जब उन्होंने अपने यहाँ उन्नत चूल्हे बना लिये तो ग्राम की महिलाओ से सम्पर्क कर उनके घर उन्नत चूल्हे बनवाने की जिम्मेदारी ली। इस तरह मुंगेला ग्राम के सभी परिवारों में महिलाओ के प्रयासों और जन चेतना से ईंधन बचत करने वाले दो मुँहे चूल्हे बन गये। इन चूल्हों के बनने से ग्राम मुंगेला ईंधन बचत करने में प्रभावी भूमिका निभाने वाला ग्राम बन गया।उन्नत चूल्हे को लेकर महिलाओं से चर्चा कर जाना कि एक मुँह के चूल्हे में लकड़ी की अधिक खपत होती है और परिवार के एक सदस्य के दो वक्त के भोजन में १.५ से २ किलो लकड़ी की खपत होती है।इस आधार पर पांच सदस्यों के परिवार में यदि एक दिन में १० किलो लकड़ी लगती है तो वह इन चूल्हों पर आधी हो जाती है। इससे ग्राम की कुल जनसंख्या में खपत की मात्रा निकाली गई तो जहाँ ८२५ किलो लकड़ी की प्रतिदिन खपत होती थी वह घट कर आधी हो गई है। यानि एक वृक्ष को रोज कटने से बचाया जा रहा है। ईंधन बचाने के इस प्रयोग के साथसाथ पूरे गाँव के संकल्प व सहयोग से यह ग्राम अब पूर्णतः सी.एफ.एल. ग्राम भी बन गया है। गाँव को ऊर्जा बचत का आदर्श अनुकरणीय उदाहरण बनाने में ग्राम विकास प्रस्फुटन समिति के श्री राधेश्याम, श्री संजय राठौर, श्री कवंरलाल का विशेष योगदान रहा। इस तरह ऊर्जा बचत के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मुंगेला ग्राम की महिलाओ द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा रही है।
बढ़ती जनसंख्या और विकास की ओर अग्रसर संसार में ऊर्जा की कमी एक बड़ा संकट है। ऊर्जा उत्पादन की अपनी सीमाएँ है और मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अक्षय ऊर्जा के विकास और विस्तार की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। हमें गैरपारम्परिक स्त्रोतों से विद्युत उत्पादन एवं रसोई गैस निर्माण पर विशेष ध्यान देना होगा। ऊर्जा के वैकल्पिक उपायों को प्रचलन में लाना होगा। वर्तमान ऊर्जा संकट को देखते हुए म.प्र.जन अभियान परिषद् की प्रस्फुटन समितियों ने ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों के विकास पर कार्य कर अनोखे उदाहरण प्रस्तुत किए है।बायो गैस गाँव उबदी : ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोंतो के इन्हीं प्रयासों का आदर्श स्वरूप है इंदौर संभाग के खरगौन जिले का प्रस्फुटन ग्राम उबदी। यहाँ म.प्र. जन अभियान परिषद् के अंतर्गत गठित प्रज्ञा ग्राम विकास प्रस्फुटन समिति ने सर्वप्रथम ग्रामवासियों में स्वप्रेरणा का अलख जगाया है। हर घर में बायोगैस संयंत्र लगाकर अपने गाँव को बायोगैस गाँव बनने का गौरव हासिल किया है। समिति की प्रेरणा और मार्गदर्शन से लोगों में जागृति आयी है जिसके चलते आज गाँव की तस्वीर ही बदल गई है।बायोगैस लगाने व बायोगैस संयंत्र के संदर्भ में समिति सदस्यों को तकनीकी सहयोग के लिए तत्कालीन संभाग समन्वयक श्री अशोक पाटीदार तथा जिला समन्वयक श्री सुशील बरूआ ने समय समय पर जानकारी देकर प्रोत्साहित किया। ग्राम में ऊर्जा संरक्षण के लिए गोबर गैस के प्रयोग पर बल दिया गया। जिन घरों में पशुपालन हो रहा है उन्हें गोबर गैस संयंत्र लगाने के लिए प्रेरित किया। प्रस्फुटन समिति सदस्यों ने ग्रामवासियों को सबसे पहले बायोगैस से होने वाले लाभ के बारे में बताया। लोगों में भी इसके प्रति जागरूकता आयी और गाँव में ७० घरों में गोबर गैस संयंत्र लग गये।गौबर गैस संयत्र लगाने के आरंभिक प्रयासों के परिणामों से गाँव में एक चेतना जागृत हुई और देखते देखते सम्पूर्ण गाँव में गोबर गैस का उपयोग होने लगा। कार्य से प्रेरित होकर आसपास के ग्रामों की समितियाँ भी गोबर गैस संयंत्र पर कार्य कर रही हैं। गोबर गैस संयंत्र लगने से लोगों को खेतों के लिए खाद भी मिल रही है तथा पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं हो रहा है। इस तरह ऊर्जा की बचत और गैरपारम्परिक ऊर्जा स्त्रोतों के उपयोग से कार्बन उर्त्सजन को कम किया जा सकता है। जिससे एक तरफ ऊर्जा की कमी को पाटा जा सकता है दूसरा वैश्विक तापमान वृद्घि से बिगड़ते पर्यावरण के दुष्प्रभाव से बचाने में मदद मिल सकती है।
प्रदेश के १८८ प्रस्फुटन गाँव पूर्ण सी.एफ.एल.
ऊर्जा विकास की जीवन धारा है। विकास के लिए ऊर्जा की आवश्यकता ठीक वैसी ही है जैसी जीवन के लिए ऑक्सीजन की। विकास के साथ हमारी ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। यह बढ़ोत्तरी शताब्दी के अंत तक ३५ गुना होने का अनुमान है। आज भोजन, हवा, पानी की तरह विद्युत ऊर्जा हमारे जीवन का आवश्यक अंग है। बिना विद्युत के हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। दैनिक क्रियाकलापों से लेकर कृषि, उद्योग जगत तथा विकास के हर क्षेत्र में विद्युत ऊर्जा पहली आवश्यकता है।बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण और विकास के लिए विद्युत मांग की लगातार वृद्घि से विद्युत उत्पादन और उपलब्धता के प्रतिशत में काफी अंतर है जिससे विद्युत ऊर्जा का संकट खड़ा हो गया है। विद्युत ऊर्जा का यह संकट भारत जैसे विकासशील देश में ही नहीं समूची दुनिया पर है। कुछ अरसे पहले ब्रिटेन के यूके एनर्जी रिसर्च सेंटर के डेढ़ सौ विशेषज्ञों की पैनल ने निकट भविष्य में ब्रिटेन में बिजली का बड़ा संकट खड़ा होने की संभावना प्रकट की थी। लगभग यही हालत दुनिया के अन्य विकास की ओर बढ़ते देशों की है।विद्युत मांग और आपूर्ति के विभेद से सभी चिंतित हैं। बढ़ते विकास के इस दौर में विशाल जनसंख्या वाले देश भारत के लिए यह एक बड़ा प्रश्न है। विद्युत कमी की इस हम समस्या के समाधान के लिए उत्पादन के स्त्रोत बढ़ाने के साथ आवश्यकता है विद्युत ऊर्जा के अपव्यय को रोकने की।"ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है'' म.प्र. जन अभियान परिपर कार्य किया। विचार को व्यवहार में बदलने के लिए निर्णय लिया कि भारत के आधार गाँवों से ही इस कार्य की शुरूआत की जाए। प्रदेश के गाँवों को सी.एफ.एल. गाँव बनाने की अभिनव संकल्पना पर कार्य शुरू किया गया। उद्देश्य था गाँवों को पूर्ण सी.एफ.एल. गाँव बनाना।पूर्ण सी.एफ.एल. गाँव बनाने की कल्पना पर प्रदेश में सर्व प्रथम कार्य आरंभ किया इन्दौर संभाग के खरगोन जिले अन्तर्गत सैगाँव विकासखण्ड के गंधावड़ गाँव ने। जन अभियान परिषद् की जय बलराम प्रस्फुटन समिति के माध्यम से गंधावड़ गाँव में ऊर्जा बचत हेतु अभियान चलाया गया। सर्वप्रथम गाँव का सर्वे किया गया जिससे पता चला कि गाँव में ४० से ५० प्रतिशत घरों में कुछ संख्या में सी.एफ.एल. लगी हैं लेकिन पूर्ण सी.एफ.एल. गाँव बनाने के लिये १०० प्रतिशत का लक्ष्य पूरा करना जरूरी था। अतः जन अभियान परिषद् द्वारा एक विस्तृत कार्ययोजना बनायी गयी और ऊर्जा बचत को लेकर वाट मीटर द्वारा डेमोन्स्ट्रेशन भी दिया गया।इसके उपरांत प्रस्फुटन समूह जय बलराम प्रस्फुटन समिति द्वारा बल्ब की जगह सी.एफ.एल. "ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है'' म.प्र. जन अभियान परिषद् की प्रस्फुटन समितियों ने इसी विचार उपयोग हेतु जन मानस को तैयार किया गया। देखते ही देखते ८० प्रतिशत घरों में सी.एफ.एल. उपयोग होने लगा किंतु लक्ष्य गाँव को १०० प्रतिशत सी.एफ.एल. गाँव बनाने का था। इस अभियान में समस्या तब खड़ी हुई जब गाँव के निर्धन परिवारों ने अपनी आर्थिक स्थिति के कारण सी.एफ.एल. खरीदने में समर्थता बताई। प्रस्फुटन समिति सदस्यों ने विचार विमर्श कर पहले गाँव के ४७ निर्धन परिवारों की सूची बनाई और फिर जन सहयोग के माध्यम से उन परिवारों के लिये सी.एफ.एल. की व्यवस्था करवाई। बस फिर कोई बाधा न थी, प्रस्फुटन गाँव गंधावड़ प्रदेश का पहला १०० प्रतिशत सी.एफ.एल. गाँव बन गया।अब इस विषय को सम्पूर्ण प्रदेश में लागू करने के लिये तकनीकी पक्ष का समझना था अतः प्रस्फुटन समिति द्वारा जन अभियान परिषद् के मार्गदर्शन में सी.एफ.एल. द्वारा बदले गये बल्बों का सर्वेक्षण किया गया। व लागत निकाली गयी जिससे यह बात स्पष्ट हुई कि गाँव में जब बल्बों का उपयोग होता था, तब पारवरलोड एवं विद्युत खपत ५९ किलो वॉट एवं ३०५ किलो वॉट प्रतिघंटा यूनिट थी, जो सी.एफ.एल. उपयोग पर घटकर ११ किलो वॉट एवं ६० किलो वॉट प्रतिघंटा यूनिट ही रह गयी। इस आधार पर गाँव की वार्षिक विद्युत बचत ८९,४२५ किलो वॉट प्रतिघंटा यूनिट होगी अर्थात यह गाँव अनुमानतः ८० प्रतिशत विद्युत की बचत कर रहा है। गंधावड़ गाँव के १०० प्रतिशत सी.एफ.एल. होने की अनुकरणीय पहल से इन्दौर संभाग का ही बामनसुता गाँव पूर्ण सी.एफ.एल. हो गया।देखते ही देखते सी.एफ.एल. गाँव बनने की यह धारा पूरे प्रदेश में बहने लगी है। प्रस्फुटन समितियों ने ऊर्जा का युक्ति युक्त उपयोग कर ऊर्जा संरक्षण का अभिनव प्रयास किया है। सी.एफ.एल. गाँव बनने का यह अनूठा अभियान पहली बार म.प्र. में चला है। विशेषता यह है कि यह सम्पूर्ण कार्य किसी योजना अथवा अनुदान के तहत न होकर स्वैच्छिक, सामूहिक प्रयासों से हो रहा है। प्रस्फुटन समितियों की इच्छाशक्ति और जन भागिदारी के समन्वय से आज प्रदेश के १८८ गाँव पूर्ण सी.एफ.एल. होकर दूधिया रोशनी से जगमगा रहे हैं।
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